Thursday, November 11, 2010

जुर्म-ए -उल्फत

इश्क कि बाज़ी थी खेली और हार दी
हमसे अब न कहना कि यूँ ही गुज़ार दी

वोह इश्क में करते रहे कुछ एसी तजारत
इक उम्र के बदले में मोहब्बत उधार दी

इन तारीकियों में शायद खुद को मिल ही जाएँ
कैसे हसीं गुमां में वो जुल्फें संवार दी

वोह छुप के दरीचों से हमें देखते रहे
हमने भी उस गली में सदा बार बार दी

मुद्दत के बाद उनको हम यूँ हसीं लगे
इक नज़र में उसने नज़र ही उतार दी

कमबख्त मेरी गज़ल के मायने बदल गया
जब मेरी सबा के एवज अपनी बहार दी

Wednesday, November 10, 2010

जिंदगी

देखा इक मकाम पर
इस मोड से कुछ दूर
जलवा-ए जिस्म से
गोशा गोशा रोशन ,
बे-पनाह हुस्न पे इतराती हुई
इक महबूब कि मानिंद ,
दिल में इक राज़ लिए
खुद पे मुस्कुराती हुई,
इक हसीना जो बस इस
इंतज़ार में थी,
फलक के लाख सितारे
बा-सजदा होंगे अभी....
मगर इस कदर वोह
बदगुमाँ शाम ढली
लौटा ,के फिर  देखूं वो हसीन फज़ा
पर न वो रंग,वो नूर ,वो इतराना
न वो मेरी कही बात पे शर्मना
न वो ज़ुल्फ़ , न ख़म ,न काजल को लकीर
इक सियाही बरपा थी रूखे -रोशन पर
गर्द-ए-राहे सफर ही थी जूं नसीब उसका .....

मैं उस से पूछने ही वाला था कि कौन है तू
नज़र झुका के वोह बोली कि जिंदगी हूँ मैं .....

Wednesday, November 3, 2010

यह कैसी उम्मीद ??

दिन गुज़र चुका उस हसीन बात के बाद
नयी सदी उठेगी अब इस रात के बाद

जो गुज़रनी थी  हम पर  , गुज़र है चुकी
क्या होगी कयामत इन हालात के बाद

हमसे पहले खेलते इश्क की बाज़ी
क्या लुत्फ़ रहेगा अब मेरी मात के बाद

रोएँ तो ,जाएँ तो ,यार के काँधे पर
और क्या मांगना इस सौगात के बाद

इस अदा से झटकते हैं वोह ज़ुल्फ़ से पानी
कई मौसम बदल गए इस बरसात के बाद

Tuesday, November 2, 2010

मासूम सनम ......

 अपनी शब से तलिस्समों को मिटाना होगा
उनको सुबह के छलावों से मिलाना होगा

सर पे बोझ जफ़ाओं का लिए फिरते हैं
जो समझते थे कि क़दमों में ज़माना होगा

कितने भोले हैं सनम ,रकीबों से कहा करते हैं
हमें इक वादा -ए - वफ़ा भी तो निभाना होगा

शबे - फुर्क़त की हकीकत ने जगाया है जिसे
उसको ख्वाबों के दरीचों में बुलाना होगा

इस लुटे दर पे भला आज यह दस्तक क्यूँ है
उठ के देखूं , यह वही चोर पुराना होगा

Saturday, October 30, 2010

SHE....

Why, oh why, I never told her
it was so good to hold her;
when I am beyond all seeing,
and an eternity touches my being ;
A phantasm assails my learned art
touching the inner lining of my heart ;
when the walls close in on me,
and there is only emptiness to see ;
Then , a little bird whispers  ,somehow,
it'll be better to hold her now.....

Friday, October 15, 2010

तुझे याद रहे .......

वफ़ा की राह पे तू शाद -ओ -आबाद रहे
पर तुझे अपनी जफ़ाओं का सफर याद रहे

शाम -ए -वस्ल  मुबारक, ए  बिछड़े सनम
कैसे   बिखरा था नशेमन मगर याद रहे

साथ जब यार चलें ,ज़िक्र मोहब्बत के रहें
बस   किसी  घर की वीरान डगर याद रहे

कैसे करते हैं चुपके से दिलों के टुकड़े
खुदा करे तुझे  यह ही हुनर याद रहे

जब किसी  गैर  के चहरे पे झुकाना पलकें
अपने आँगन का तन्हा सा शजर याद रहे

वैसे तूफां में सफीने की  फिकर क्यूँकर हो
मन की मौजों को  अगर दिल की लहर याद रहे

Wednesday, October 6, 2010

इक़ बार फिर...

वह कहने लगे, आ जाना वहीं
इस बार तुम्ही हो सनम मेरे
हम गए, मगर अब क्या बोलें
के कितने सब्र से काम लिया

था इल्म हमे साकी है वहीं
और वहीं हमारा क़ातिल है;
लुटने की चाहत में हमने
उन्हीं से दोबारा जाम लिया

जब तर्के-वफ़ा का ज़िक्र चला
जब बात निभाने पर ठहरी,
हम तब भी मगर कुछ कह न सके
गो सब ने तुम्हारा नाम लिया

कुछ दश्त-ऐ-सफर की तारीकी
कुछ तन्हाई ,कुछ बेचैनी;
हाथ बढा कर तब हमने
खुद अपना बाजू थाम लिया

है चाक-गिरेबां मुद्दत से
सब बंद-ए- कबा हैं बिखरे हुए;
नये दौर की लैला से हमने,
वही पहले सा ईनाम लिया