Saturday, December 18, 2010

The Thorn birds....revisited

Methought I chose the longest thorn
and had my heart in rips
what came out was just a croak
a wail of broken relatoinships

The world went on and no one turned
to hear that fractured song
maybe I did'nt bleed enough
or the legend is all wrong

Let's then change the rules
by which this game we play
you gotta have two untrue lips
to have love come your way

Maybe then the hearts won't bleed
and the phoenix be on wing
maybe then the birds will pause
to hear a true man sing

Wednesday, December 8, 2010

You......

And, I had seen
the world's fetish with the `I '
with`mine ', `me' and `my '
what ignominy !
I almost said `bye-bye '
I thought I had SEEN IT
I thought I was through,
till I saw eternity's amazement
at the `you ness 'of you.....

Saturday, December 4, 2010

उन्वान अब और नहीं हैं ........

करता हूँ मोहब्बत इक तस्वीर के साथ
हैं ख्वाब खफा जब से ताबीर के साथ

दिल-शाद अदा उनकी और मासूम तकल्लुम
लगता है कि करते हैं बड़ी तदबीर के साथ

मेरी रातों को चरागों का गुमां हो गुज़रा
वोह मुझ से मिला था इस तनवीर के साथ

आज़ाद शाम के धुन्दलकों ने क्यूँ कहा मुझ से
कितने रोशन  थे तुम  उस   ज़ंजीर के साथ

मेरी नज्में तो मेरी तख्लियत कि हामिल हैं
किसने पाई है मोहब्बत फकत तहरीर के साथ

हाँ ,वोह चले गए लेकिन,मुस्का के तो गए
कोई गिला नहीं है अब तकदीर के साथ

Tuesday, November 16, 2010

रस्म-ए-शहर-ए- हुस्न

ना डूबे हैं सफीने न लहरों में गहराई
क्या खाक मज़ा लेंगे साहिल के तमाशाई

इक दिन की मोहब्बत का मज़ा  देखते हैं
बे-रंग-ओ-वफ़ा निकली उमरों की शनासाई

अच्छा है  इस हयात के काबिल तो हुए
दिल में कोई उमंग है न क़दमों में तवानाई

घबरा के अंधेरों का पता पूछते रहे
उनको डराती रही उन्ही की परछाई

कब नसीब होगा हमें रंग-ओ-राज़-ओ -नियाज़
किस दिन कता करेंगे वोह गैर से रमज़ाई

तुम ही कहो ...

तुम को देखूँ कि खुद से बात करूँ
इस हसीं दिन को कैसे रात करूँ

क़त्ल हो जाऊं और दम भी न निकले
तुम्ही कहो यह कैसे करामात करूँ

जिस में तू बा-वफ़ा निकले
अब तामीर वो कायनात करूँ

क्यूँ खुद को खुदा समझता था
ना-खुदा से कुछ सवालात करूँ

तुम साथ दो तो फिर क्यूँ ना
इसी  सफर को असल-ए-हयात करूँ

जब उस हसीं से खेल ली बाज़ी
दिल कहे खुद ही अपनी मात करूँ

Saturday, November 13, 2010

शराब-ए-कोहना

उनकी हया से पूछें कि उनके हिजाब से
कर लें क्या मोहब्बत अब हम जनाब से

आँखों में आँखें आपकी फिर क्यूँ न डाल दें
बनती नहीं है बात कुछ जानम शराब से

लोग उनकी पहेली को अलग बूझते रहे
खड़े हम भी थे परेशां इस इंतखाब से

कहने लगे के दिन में न होना रु -ब -रु
ज़ायदा  हसीन लगते हो अपने ही ख्वाब से

देखें क्या करेंगे वोह हम से अब सवाल
कुछ कांप से गए हैं मेरे पहले जवाब से

पूछती है अपने ही माहताब से किरण
यह कौन निकल आया दिन में नकाब से

Thursday, November 11, 2010

जुर्म-ए -उल्फत

इश्क कि बाज़ी थी खेली और हार दी
हमसे अब न कहना कि यूँ ही गुज़ार दी

वोह इश्क में करते रहे कुछ एसी तजारत
इक उम्र के बदले में मोहब्बत उधार दी

इन तारीकियों में शायद खुद को मिल ही जाएँ
कैसे हसीं गुमां में वो जुल्फें संवार दी

वोह छुप के दरीचों से हमें देखते रहे
हमने भी उस गली में सदा बार बार दी

मुद्दत के बाद उनको हम यूँ हसीं लगे
इक नज़र में उसने नज़र ही उतार दी

कमबख्त मेरी गज़ल के मायने बदल गया
जब मेरी सबा के एवज अपनी बहार दी